Nakshatra in Vedic Astrology : वैदिक ज्योतिष के नक्षत्रों का रहस्यमय संसार

Nakshatra in Vedic Astrology

(भाग्य के सितारे – भाग 1)

जब तारे बोलते हैं…

Zodiac signs हमारे जीवन की बाहरी परत को दिखाते हैं, जबकि Nakshatra in Vedic Astrology हमारी आत्मा की गहराई तक उतरते हैं। यही नक्षत्र हमें बताते हैं कि हम कौन हैं, क्यों सोचते हैं, और हमारा जीवन किस दिशा में आगे बढ़ेगा। इनकी गणना चंद्रमा की स्थिति से की जाती है, जो हमारे मन और भावनाओं का कारक है। इस प्रकार, ये सूक्ष्म स्तर पर हमारे व्यक्तित्व की थाह लगा लेते हैं।”

रात का शांत आकाश… अनगिनत तारे टिमटिमाते हैं।
क्या आपने कभी सोचा है — ये तारे केवल रोशनी नहीं देते, ये हमारे भाग्य की कहानियाँ भी कहते हैं। वैदिक ज्योतिष में इन्हें नक्षत्र कहा गया है — आकाश के 27 अद्भुत पड़ाव, जो हर जन्म, हर भावना और हर कर्म को एक अदृश्य धागे से जोड़ते हैं। प्रत्येक नक्षत्र की अपनी एक विशेष ऊर्जा, देवता और प्रतीक है, जो हमारे स्वभाव और जीवन पथ को गहराई से प्रभावित करते हैं। ये हमारे अंतर्मन के सबसे गुप्त रहस्यों को भी उजागर करने की क्षमता रखते हैं।

Nakshatra in Vedic Astrology : शब्द का अर्थ और उत्पत्ति

संस्कृत में नक्षत्र शब्द दो भागों से बना है — “नक्ष” (आकाश) और “त्र” (संरक्षक)।
अर्थात् — “आकाश का रक्षक या वह जो भाग्य की रेखाओं की रक्षा करता है।”

वैदिक ग्रंथों के अनुसार, ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि का निर्माण किया, तब उन्होंने आकाश को 27 भागों में बाँट दिया ताकि चंद्रमा हर भाग में एक-एक दिन बिताए। इस प्रकार 27 नक्षत्रों का जन्म हुआ।

मिथक कहता है कि दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियाँ थीं, जिन्हें उन्होंने चंद्रमा से विवाह करवा दिया।
प्रत्येक पुत्री एक नक्षत्र थी — आश्विनी से लेकर रेवती तक।
चंद्रमा को हर दिन एक नक्षत्र-पत्नी के साथ रहना था, परंतु उन्हें रोहिणी सबसे प्रिय थी।
इस पक्षपात से क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें शाप दिया —

“हे चंद्र! तुम क्षीण होते जाओगे।”

और तब से ही चंद्रमा कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में घटता-बढ़ता है।
यह कथा केवल पुराण नहीं, बल्कि इस तथ्य का प्रतीक है कि मन (Moon) हर दिन अलग भाव से गुजरता है, क्योंकि वह रोज़ एक नए नक्षत्र से प्रभावित होता है।

Nakshatra in Vedic Astrology: ज्योतिषीय रहस्य

वैदिक ज्योतिष में 360° आकाश को 27 बराबर भागों में बाँटा गया है। हर नक्षत्र का विस्तार 13°20′ होता है, जिसे आगे चार चरणों (चरण) में विभाजित किया जाता है, जो विश्लेषण को और भी सूक्ष्म बना देता है। चंद्रमा हर नक्षत्र में लगभग एक दिन रहता है और 27 दिनों में पूरा चक्र पूरा करता है। इस चंद्रमा की यात्रा का सीधा संबंध हमारी मानसिक और भावनात्मक दशाओं से है, जो प्रतिदिन बदलती रहती हैं। यह गति हमारे आंतरिक लय को दर्शाती है।

इसीलिए किसी व्यक्ति का जन्म नक्षत्र (Janma Nakshatra) उसकी भावनाओं, सोचने के तरीके और कर्मों पर गहरा प्रभाव डालता है। यह हमारे स्वभाव की नींव है, जो जीवन भर हमारे साथ रहती है। “अगर राशि शरीर है, तो नक्षत्र आत्मा है।” जहाँ राशि व्यापक लक्षण दिखाती है, वहीं नक्षत्र व्यक्तिगत पहचान और आत्मा के गहरे उद्देश्य को प्रकट करता है। यही कारण है कि Nakshatra in Vedic Astrology को सबसे सूक्ष्म और सटीक माना गया है, क्योंकि यह हमारे अस्तित्व के मूल तक पहुँचता है।

Nakshatra in Vedic Astrology : नक्षत्रों की संरचना और तत्व

हर नक्षत्र के पाँच मुख्य घटक होते हैं —

देवता (Deity): जो नक्षत्र को दिव्य ऊर्जा देता है।

स्वामी ग्रह (Ruling Planet): जो व्यवहार और परिणाम तय करता है।

प्रतीक (Symbol): जो उसकी ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।

शक्ति (Power or Shakti): जो उस नक्षत्र की छिपी क्षमता बताती है।

चार पाद (Four Padas): हर नक्षत्र के चार भाग होते हैं जो राशि चक्र के अलग-अलग हिस्सों में फैलते हैं।

उदाहरण के लिए —

आश्विनी नक्षत्र: देवता – अश्विनी कुमार, शक्ति – आरोग्य और आरंभ करने की क्षमता।

रोहिणी नक्षत्र: देवता – ब्रह्मा, शक्ति – सृजन और सौंदर्य।

Nakshatra in Vedic Astrology : नक्षत्रों का वर्गीकरण

प्राचीन ऋषियों ने नक्षत्रों को तीन प्रमुख श्रेणियों में बाँटा:

देव (Divine Nakshatra): शांत, कोमल और दयालु। जैसे — पुनर्वसु, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी।

मानुष (Human Nakshatra): संतुलित, व्यवहारिक। जैसे — हस्त, अनुराधा, श्रवण।

राक्षस (Demonic Nakshatra): तीव्र, साहसी, महत्वाकांक्षी। जैसे — भरणी, मघा, मूल।

इन तीनों प्रवृत्तियों का मिश्रण हर मनुष्य में होता है।
जन्म जिस नक्षत्र में होता है, वही बताता है कि हमारे भीतर कौन-सी प्रवृत्ति प्रबल है।

Nakshatra in Vedic Astrology : मिथकीय रहस्य: नक्षत्रों की कहानियाँ

आश्विनी नक्षत्र – जीवन का आरंभ

कथा है कि जब एक ऋषि मृत्यु के समीप थे, तब अश्विनी कुमार, देवताओं के वैद्य, अपने स्वर्ण रथ पर आए और उन्हें नया जीवन दिया।
तब देवताओं ने कहा — “यह नक्षत्र जीवन का पुनर्जन्म है।”
इसीलिए आश्विनी नक्षत्र में जन्मे लोग ऊर्जावान, साहसी और दूसरों की मदद करने वाले होते हैं।

रोहिणी नक्षत्र – सौंदर्य और सृजन की देवी

रोहिणी वह नक्षत्र है जिससे चंद्रमा का सबसे गहरा प्रेम जुड़ा।
यह नक्षत्र सृजन, सुंदरता और आकर्षण का प्रतीक है।
जिनका जन्म रोहिणी नक्षत्र में होता है, उनमें कलात्मकता, कोमलता और आकर्षण स्वाभाविक होता है।

मृगशीर्ष नक्षत्र – खोज और जिज्ञासा

मृग का अर्थ है ‘हिरण’। यह नक्षत्र उस आत्मा का प्रतीक है जो सत्य की तलाश में हर दिशा में दौड़ता है।
ऐसे जातक जिज्ञासु, खोजी और प्रयोगशील स्वभाव के होते हैं।

Nakshatra in Vedic Astrology का गूढ़ संदेश

हर नक्षत्र एक अदृश्य शक्ति है जो हमें हमारे कर्मफल से जोड़ता है।
यह हमारे भीतर की छिपी ऊर्जा को जगाता है और जीवन को उसकी दिशा देता है।

जैसे—

मघा बताता है कि आत्मा राजसी कर्म के लिए जन्मी है।

मूल याद दिलाता है कि हमें जड़ों तक लौटना होगा।

पुष्य सिखाता है कि पालन और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

Nakshatra in Vedic Astrology :भाग 1 – समापन

नक्षत्र केवल ज्योतिष का हिस्सा नहीं — यह मानव मन का आईना हैं।
हर नक्षत्र एक भावना, एक जीवन कथा और एक आध्यात्मिक ऊर्जा को दर्शाता है।

“हर आत्मा किसी न किसी नक्षत्र से जन्मी है। और जब हम अपने जन्म नक्षत्र को पहचान लेते हैं, तो हमें अपने भीतर के ब्रह्मांड का दरवाज़ा दिखने लगता है।”

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Nakshatra in Vedic Astrology : अगले भाग में (Part 2):
हम जानेंगे — 27 नक्षत्रों की पूरी सूची, उनके स्वामी ग्रह, देवता, प्रतीक और उनके जीवन पर प्रभाव।

Nakshatra in Vedic Astrologyके लेखक— राजीव सरस्वत
राजीव सरस्वत एक प्रसिद्ध ज्योतिष लेखक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं, जो वैदिक ज्योतिष को आधुनिक सोच और मानवीय भावनाओं के साथ जोड़ते हैं।
उनका उद्देश्य है कि हर पाठक ग्रहों, अंकों और संकेतों के माध्यम से अपने जीवन की दिशा को बेहतर समझ सके।

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Radha Krishna Prem Kahani: एक अलौकिक प्रसंग जिसे जानकर हृदय प्रेम रस से भर जाएगा

Radha Krishna Prem Kahani

भारत की संस्कृति में अगर सबसे पवित्र और अनूठे प्रेम का उदाहरण पूछा जाए तो हर कोई एक ही नाम लेता है – Radha Krishna Prem Kahani। यह कोई साधारण प्रेमकथा नहीं है, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।
Radha और Krishna का प्रेम सांसारिक आकर्षण से परे है। यह न तो मोह है, न ही किसी बंधन में बंधा हुआ संबंध, बल्कि यह तो पूर्ण समर्पण और निष्काम भक्ति का अद्वितीय उदाहरण है।

कृष्ण की बांसुरी और राधा का समर्पण

एक बार की बात है, वृंदावन में कृष्ण यमुना तट पर बांसुरी बजा रहे थे। उनकी बांसुरी का मधुर स्वर सुनकर सभी जीव-जंतु, पक्षी, और ग्वाल-बाल मंत्रमुग्ध हो गए।
लेकिन जब वह स्वर राधा जी तक पहुँचा, तो उनका हृदय जैसे कृष्ण में विलीन हो गया।

सखियाँ बोलीं –
“राधे, तुम्हें तो बस कृष्ण की बांसुरी का नाद सुनते ही सब कुछ भूल जाता है!”

राधा जी मुस्कुराकर बोलीं –
“यह बांसुरी नहीं बज रही, यह तो कृष्ण के हृदय की व्यथा है जो मेरे हृदय तक पहुँचती है।”

यही है Radha Krishna Prem Kahani का सार – जब प्रेम में कोई वाद्य भी संदेशवाहक बन जाए और आत्मा सीधा आत्मा से बात करे।

राधा का रूठना और कृष्ण का मनाना

एक और अद्भुत घटना है, जब रासलीला के समय राधा कृष्ण से रूठ गईं। कृष्ण हर गोपी के साथ एक-एक होकर नाच रहे थे, लेकिन राधा को लगा कि उनके प्रति विशेष स्नेह कम हो गया है।

वह चुपचाप वहां से चली गईं।
कृष्ण ने जब देखा कि राधा नहीं हैं, तो पूरा रास अधूरा हो गया। उन्होंने खोजते-खोजते अंत में राधा को मनाया।

कृष्ण बोले –
“राधे, मैं भले ही सबके साथ हूँ, लेकिन मेरा हृदय तो सिर्फ तुम्हारा है। तुम बिन तो मैं अधूरा हूँ।”

यही है Radha Krishna Prem Kahani की गहराई – जहाँ रूठना भी प्रेम को और गाढ़ा कर देता है।

कृष्ण का राधा को ‘प्राण’ कहना

एक दिन कृष्ण और राधा यमुना किनारे बैठे थे। राधा ने शरारत से पूछा –
“कृष्ण, तुम्हें सबसे अधिक प्रिय कौन है?”

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा –
“मुझे मेरा प्राण सबसे प्रिय है, और मेरा प्राण तुम ही हो राधे।”

यह उत्तर सुनकर राधा की आँखों से आँसू बह निकले। प्रेम का यह रूप भौतिकता से परे और आत्मिक स्तर पर पहुँच चुका था।

इसीलिए कहा जाता है कि Radha Krishna Prem Kahani में ‘राधा’ और ‘कृष्ण’ अलग नहीं हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं।

Radha Krishna Prem Kahani ka Adhyatmik Sandesh

इन सभी प्रसंगों का संदेश यही है कि –

प्रेम केवल रूप, आकर्षण या सांसारिक वासना पर आधारित नहीं होना चाहिए।
सच्चा प्रेम अहंकार-शून्य होता है, जहाँ एक-दूसरे के लिए पूर्ण समर्पण हो।
राधा और कृष्ण का प्रेम इस बात का प्रतीक है कि आत्मा जब ईश्वर में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाती है, तभी उसे सच्चा आनन्द मिलता है।

यही कारण है कि आज भी जब कोई प्रेम की परिभाषा पूछता है, तो लोग Radha Krishna Prem Kahani का उदाहरण देते हैं।

FAQs

Q1. क्या राधा और कृष्ण का विवाह हुआ था?

Ans. नहीं, राधा और कृष्ण का विवाह नहीं हुआ। उनका प्रेम सांसारिक नियमों से परे आत्मिक और दिव्य माना जाता है।

Q2. Radha Krishna Prem Kahani क्यों इतनी प्रसिद्ध है?

Ans. क्योंकि इसमें भक्ति, समर्पण और निष्काम प्रेम का अद्भुत संगम है। यह कथा हर युग में लोगों के हृदय को छू जाती है।

Q3. राधा कृष्ण का प्रेम हमें क्या सिखाता है?

Ans. यह हमें सिखाता है कि प्रेम में स्वार्थ या अहंकार नहीं होना चाहिए। सच्चा प्रेम वही है जो आत्मा को आत्मा से जोड़ दे।

Q4. क्या Radha Krishna Prem Kahani केवल हिंदू धर्म में मान्य है?

Ans. नहीं, यह कथा सार्वभौमिक है। प्रेम की यह पराकाष्ठा हर संस्कृति और हर इंसान को प्रेरित करती है।

Radha Krishna Prem Kahani केवल कथा नहीं, बल्कि भक्ति, त्याग और आत्मा-परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।

इस प्रेम में न कोई शर्त है, न कोई बंधन। यह प्रेम हमें सिखाता है कि जब हम अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर पूरी तरह समर्पित हो जाते हैं, तभी हमें सच्चे प्रेम का अनुभव होता है।

आज भी वृंदावन की गलियों में जब बांसुरी की धुन गूँजती है, तो हर कोई यही कह उठता है – “राधे-राधे”

अगर यह Radha Krishna Prem Kahani आपके हृदय को छू गई हो, तो इसे अपने प्रियजनों के साथ साझा करें।

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राजा हरिश्चंद्र और सत्य की अग्नि-परीक्षा: Saturn in astrology की दृष्टि से

Saturn in astrology

Saturn in astrology

शनि को भारतीय ज्योतिष में कर्म का ग्रह कहा गया है—जो इंसान के अच्छे-बुरे कर्मों का फल देता है। यही कारण है कि राजा हरिश्चंद्र की कठिनाईयाँ केवल एक राजा की नहीं, बल्कि एक आत्मा की karmic journey थीं—जैसी कि Saturn in astrology में दर्शाई जाती हैं।

भारतीय पौराणिक कथाओं में राजा हरिश्चंद्र का नाम सुनते ही मन में एक छवि उभरती है—एक ऐसा राजा जिसने जीवन की हर कठिनाई में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। पर क्या आप जानते हैं कि उनकी यह परीक्षा केवल मानवों की नहीं थी? यह एक दैविक योजना थी, जिसमें प्रमुख भूमिका निभाई थी Saturn in astrology यानी शनि ग्रह ने।

पवित्र सत्य का सामना कठोर ग्रह से

राजा हरिश्चंद्र धर्मनिष्ठ, दयालु और सत्यप्रिय थे। उनकी ख्याति तीनों लोकों में फैल चुकी थी। इसी पर संत महर्षि विश्वामित्र को संशय हुआ—क्या यह राजा हर परिस्थिति में सत्य पर डटा रह सकता है?

उन्होंने देवताओं से आग्रह किया कि वह इस राजा की परीक्षा लें। देवताओं ने यह कार्य सौंपा Shani dev को—जो कि Saturn in astrology में न्याय और कर्मफल के अधिष्ठाता माने जाते हैं।

जब शुरू हुई शनि की दृष्टि

जैसे ही राजा हरिश्चंद्र की कुंडली में Saturn in astrology का गहरा प्रभाव शुरू हुआ, उनका जीवन धीरे-धीरे उजड़ने लगा। पहले जहाँ सोने-चांदी की चमक उनके महल को रौशन करती थी, वहीं अब अंधेरे बादलों ने उनका भाग्य घेर लिया था।

एक दिन, राजसभा में बैठे-बैठे उन्हें ऐसा लगा मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उनके सिंहासन की नींव हिला दी हो। कुछ ही समय में, परिस्थितियाँ इस कदर बदल गईं कि उन्हें अपना सम्पूर्ण राज्य त्यागना पड़ा। Saturn in astrology का यह काल केवल बाहरी कठिनाइयाँ नहीं लाया, बल्कि उनके अंतरमन को भी गहरे स्तर पर परखने लगा।

राज्य से निकाले जाने के बाद उनका जीवन एक सामान्य व्यक्ति से भी बदतर हो गया। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी और छोटा पुत्र रोहिताश्व थे। लेकिन समय ने ऐसा करवट ली कि वे अपने परिवार से भी बिछड़ गए। पत्नी कहीं और चली गई और पुत्र को वह मृत समझ बैठे। एक राजा के लिए इससे बड़ा शोक और क्या हो सकता था?

Saturn in astrology की यह परीक्षा तब और कठिन हो गई जब उन्हें वाराणसी के श्मशान घाट में एक डोम के अधीन काम करना पड़ा। जहाँ कभी वे धर्मसभा में वेदों का पाठ करवाते थे, आज वहीं वे मृत देहों को जलाने का शुल्क वसूल कर रहे थे। यह कार्य न तो राजसी था, न ही सम्मानजनक, लेकिन हरिश्चंद्र ने धर्म और सत्य से एक पल के लिए भी समझौता नहीं किया।

एक दिन, श्मशान में उनकी पत्नी मृत पुत्र के शव को लेकर पहुँची। नंगे पैर, बिखरे केश और आँसू भरी आँखों में पीड़ा साफ झलक रही थी। राजा हरिश्चंद्र ने एक क्षण के लिए उसे पहचानने से इनकार कर दिया — न कि अहंकारवश, बल्कि अपने कर्तव्यवश। उन्होंने विधिपूर्वक श्मशान का शुल्क माँगा, जैसे हर किसी से लिया करते थे।

पत्नी ने कहा, “मेरे पास कुछ नहीं है महाराज, बस यह चूड़ियाँ हैं।”

हरिश्चंद्र की आँखों से अश्रुधारा बह निकली, पर आवाज दृढ़ बनी रही — “मैं राजा नहीं, इस घाट का सेवक हूँ। नियम सबके लिए एक है।”

यह था Saturn in astrology का चरम प्रभाव — जिसने राजा को दीन बना दिया, पिता को मजबूर किया, और पति को निर्मम प्रतीत कराया, लेकिन हरिश्चंद्र की आत्मा फिर भी अडिग रही — सत्य के पथ पर।द होता है—आपको भीतर से परखना।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण: Shani ki Mahadasha ya Saade Saati?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में Shani Mahadasha या Saade Saati शुरू हो जाए, तो जीवन में कई क्षेत्रों में रुकावटें आ सकती हैं।

हरिश्चंद्र के जीवन में यह प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है:

  • आठवें भाव में शनि: अचानक सब कुछ खो देना
  • बारहवें भाव में शनि: अलगाव और त्याग
  • चंद्र पर शनि का गोचर (Saade Saati): भावनात्मक पीड़ा और गहरा आत्मबोध

इन सभी स्थितियों का सार यही है कि Saturn in astrology आपको बाहरी दिखावे से मुक्त करके आंतरिक सच्चाई से जोड़ता है।

राजा हरिश्चंद्र ने कोई उपाय नहीं किया

आज के समय में अगर किसी पर शनि की दशा आती है, तो वह दान-पुण्य, व्रत, या शनि मंदिर जाना शुरू कर देता है। लेकिन हरिश्चंद्र ने ऐसा कुछ नहीं किया।

उनका एक ही उपाय था—सत्य पर अडिग रहना। और यही है Saturn in astrology की सबसे बड़ी सीख।

अंत में शनि भी हुए प्रसन्न

जब राजा हरिश्चंद्र ने अपने सारे कष्ट सहते हुए भी कभी धर्म नहीं छोड़ा, तब अंततः शनि देव प्रसन्न हो गए। उन्होंने हरिश्चंद्र को उनका परिवार, राज्य और सम्मान लौटा दिया।

Saturn in astrology यही करता है—पहले आपको सब कुछ छीनकर आपको परखता है, और फिर जब आप उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं, तो आपको पहले से कहीं ज़्यादा लौटा देता है।

आज के जीवन में इस कथा का महत्व

आज जब लोग Saturn in astrology से डरते हैं, तो यह कथा हमें यह समझाती है कि शनि का कार्य सज़ा देना नहीं, बल्कि आत्मा को मजबूत बनाना है।

  • अगर आपको लगातार नाकामियां मिल रही हैं
  • अकेलापन महसूस हो रहा है
  • या जीवन में एक लंबा ठहराव आ गया है

तो यह संकेत हो सकता है कि आप Saturn in astrology के प्रभाव में हैं।

राजा हरिश्चंद्र से मिलती हैं ये 5 ज्योतिषीय सीखें

सत्य कभी नहीं हारता

शनि आपके कर्मों का हिसाब ज़रूर लेता है

त्याग के बिना आत्मज्ञान नहीं मिलता

भक्ति से अधिक आवश्यक है कर्तव्य

शनि सज़ा नहीं देता, वह आत्मा को मांजता है

FAQs

प्र. 1: Saturn in astrology किस चीज़ का प्रतीक है?
उ. यह अनुशासन, देरी, संघर्ष और कर्मफल का ग्रह है।

प्र. 2: शनि की साढ़े साती कितने साल चलती है?
उ. लगभग 7.5 वर्ष—Moon के तीन राशियों में गोचर के दौरान।

प्र. 3: क्या सभी के लिए Saturn in astrology बुरा होता है?
उ. नहीं, अगर आपने अच्छे कर्म किए हैं और सत्य के मार्ग पर हैं, तो शनि अंत में सम्मान देता है।

प्र. 4: क्या शनि की महादशा में राजयोग संभव है?
उ. हां, यदि शनि कुंडली में शुभ स्थान पर है और व्यक्ति सत्यनिष्ठ है।

प्र. 5: सबसे बड़ा उपाय क्या है?
उ. सच्चे कर्म करना, अहंकार छोड़ना और सेवा भावना से जीवन जीना।

अंत में, मैं यह बताना चाहूँगा कि हमें Altoona , Des Moines , flint hill और Shanghai क्षेत्रों से अच्छी प्रतिक्रिया और मेल मिल रहे हैं। जो लोग वैदिक ज्योतिष में रुचि रखते हैं और अपनी व्यक्तिगत जन्म कुंडली विश्लेषण करवाना चाहते हैं, वे हमसे swatrajeev@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।
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